भारत में हींग की मांग लगातार बढ़ रही है, लेकिन देश में इसका उत्पादन अभी भी बहुत सीमित है। यही कारण है कि भारत को हर साल बड़ी मात्रा में हींग विदेशों से आयात करनी पड़ती है। देश में करीब 1200 टन से अधिक शुद्ध हींग की खपत होती है और इसके आयात पर लगभग 600 करोड़ रुपये खर्च किए जाते हैं।
भारत मुख्य रूप से अफगानिस्तान, ईरान और उज्बेकिस्तान जैसे देशों से हींग मंगाता है। ऐसे में यदि किसान इसकी खेती अपनाते हैं, तो यह न केवल उनकी आय बढ़ाने का माध्यम बन सकता है बल्कि भारत को हींग उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।
देश में पहली बार हींग की व्यावसायिक खेती को बढ़ावा देने के लिए कई शोध कार्य किए जा रहे हैं। हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पीति क्षेत्र में स्थित Centre of High Altitude Biology (CeHAB) द्वारा हींग के पौधों पर विशेष अनुसंधान किया जा रहा है। यहां ऊंचाई वाले ठंडे क्षेत्रों में बीजों से पौधे तैयार कर परीक्षण किए जा रहे हैं।
हिमाचल प्रदेश, लद्दाख, जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड जैसे ठंडे एवं शुष्क इलाके हींग की खेती के लिए उपयुक्त माने गए हैं। यदि यह प्रयास सफल होते हैं, तो किसानों के लिए आय का नया स्रोत तैयार हो सकता है और ग्रामीण युवाओं के लिए रोजगार के अवसर भी बढ़ सकते हैं।
हींग का वैज्ञानिक नाम Ferula asafoetida है और यह एपिएसी कुल का बहुवर्षीय पौधा माना जाता है। यह पौधा मुख्य रूप से ईरान और अफगानिस्तान के पहाड़ी क्षेत्रों में पाया जाता है।
इसकी जड़ों से निकलने वाले दूधिया पदार्थ को सुखाकर हींग तैयार की जाती है। भारतीय रसोई में हींग का उपयोग दाल, सब्जियों और मसालों में स्वाद बढ़ाने के लिए किया जाता है। इसके अलावा आयुर्वेद में भी हींग को पाचन और कई अन्य स्वास्थ्य लाभों के लिए उपयोगी माना गया है।
हींग के बीज हल्के भूरे और चपटे आकार के होते हैं, लेकिन इनमें निष्क्रियता यानी Dormancy पाई जाती है, जिसके कारण इनका अंकुरण आसानी से नहीं होता।
बेहतर अंकुरण के लिए बीजों को ठंडा उपचार यानी चिलिंग ट्रीटमेंट दिया जाता है। आमतौर पर अक्टूबर और नवंबर के दौरान बीज बोए जाते हैं ताकि प्राकृतिक ठंड से उनकी निष्क्रियता समाप्त हो सके और अंकुरण बेहतर हो।
हींग एक बहुवर्षीय फसल है और इसमें फूल आने में लगभग 5 वर्ष तक का समय लग सकता है। इसके पौधों में पीले रंग के फूल आते हैं और एक ही पौधे में नर और मादा दोनों प्रकार के फूल पाए जाते हैं।
इसका परागण मुख्य रूप से कीटों के माध्यम से होता है। मई-जून के दौरान फूल निकलते हैं और अगस्त तक बीज तैयार हो जाते हैं। ध्यान रखने वाली बात यह है कि जिस पौधे से बीज प्राप्त किए जाएं, उससे हींग का राल नहीं निकालना चाहिए।
हींग की खेती के लिए ऐसी भूमि उपयुक्त मानी जाती है जहां जल निकासी अच्छी हो और धूप पर्याप्त मात्रा में मिले। पहाड़ी और ढलानदार क्षेत्र इसके लिए ज्यादा अनुकूल होते हैं।
एक हेक्टेयर भूमि में सीधे बुवाई करने के लिए लगभग 1 किलो बीज पर्याप्त माना जाता है। यदि पहले नर्सरी में पौधे तैयार किए जाएं तो बीज की आवश्यकता कम हो जाती है। पौधों की कतारों के बीच 1 से 1.5 मीटर तथा पौधों के बीच 0.75 से 1 मीटर की दूरी रखनी चाहिए।
Ferula asafoetida की खेती के लिए ठंडा और शुष्क मौसम सबसे उपयुक्त माना जाता है। यह फसल 5 से 10 डिग्री सेल्सियस तक के न्यूनतम तापमान और 35 से 40 डिग्री सेल्सियस तक के अधिकतम तापमान को सहन कर सकती है।
फसल के अच्छे विकास के लिए पर्याप्त धूप जरूरी होती है। मिट्टी की बात करें तो अच्छी जल निकासी वाली रेतीली दोमट मिट्टी सबसे बेहतर मानी जाती है। जलभराव की स्थिति पौधों के लिए नुकसानदायक साबित हो सकती है।
हींग की जड़ें गहराई तक जाती हैं, इसलिए इसे अधिक सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती। रोपाई के शुरुआती एक महीने तक 2 से 3 दिन के अंतराल पर हल्की सिंचाई करनी चाहिए। इसके बाद आवश्यकता के अनुसार ही पानी देना उचित रहता है।
खेत में जलभराव नहीं होना चाहिए, क्योंकि इससे पौधों को नुकसान पहुंच सकता है। समय-समय पर निराई-गुड़ाई करना भी जरूरी है ताकि खरपतवार नियंत्रित रहें और पौधों का विकास बेहतर हो सके।
हींग के पौधों से उत्पादन प्राप्त करने में लगभग 4 से 5 वर्ष का समय लगता है। फूल आने से पहले पौधे की जड़ों में चीरा लगाया जाता है, जिससे दूधिया राल निकलती है।
इस प्रक्रिया को कई बार दोहराया जाता है जब तक राल निकलना बंद न हो जाए। बाद में इस राल को सुखाकर हींग तैयार की जाती है। बाजार में यह ‘आंसू’, ‘मास’ और ‘पेस्ट’ जैसे विभिन्न रूपों में बेची जाती है।
हींग की बाजार कीमत उसकी गुणवत्ता के अनुसार काफी अधिक होती है। इसकी कीमत लगभग 5,000 रुपये से 25,000 रुपये प्रति किलो तक पहुंच सकती है।
एक पौधे से करीब 20 से 25 ग्राम तक हींग प्राप्त हो सकती है। यदि किसान एक हेक्टेयर क्षेत्र में इसकी खेती करते हैं, तो लगभग 5 वर्षों बाद करीब 9 लाख रुपये तक की आय अर्जित की जा सकती है।
भारत में हींग की खेती भविष्य में किसानों के लिए एक लाभकारी और नई आय का स्रोत बन सकती है। सही तकनीक, उपयुक्त जलवायु और वैज्ञानिक मार्गदर्शन के साथ किसान इस फसल से अच्छी कमाई कर सकते हैं।
यदि सरकार और कृषि अनुसंधान संस्थानों का सहयोग लगातार मिलता रहा, तो आने वाले समय में भारत हींग उत्पादन में आत्मनिर्भर बन सकता है और किसानों की आर्थिक स्थिति को भी मजबूत किया जा सकता है।
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