कम बारिश के बीच कृषि विभाग की धान और सोयाबीन किसानों को अहम सलाह

By : Tractorbird Published on : 19-Jul-2026
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धान और सोयाबीन किसानों को कृषि वैज्ञानिकों की एडवाइजरी

खरीफ सीजन की शुरुआत हो चुकी है, लेकिन मध्य प्रदेश के कई जिलों में अब तक सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई है। ऐसे में खेतों में पर्याप्त नमी नहीं होने के बावजूद सोयाबीन और धान जैसी खरीफ फसलों की जल्दबाजी में बुवाई करना किसानों के लिए नुकसान का कारण बन सकता है। इसी स्थिति को देखते हुए कृषक कल्याण एवं कृषि विकास विभाग, मध्य प्रदेश ने कृषि वैज्ञानिकों की सलाह के आधार पर विस्तृत एडवायजरी जारी की है। 

विभाग ने स्पष्ट किया है, कि बुवाई का सही समय केवल कैलेंडर से तय नहीं होता, बल्कि खेत में मौजूद वास्तविक नमी के आधार पर निर्णय लेना चाहिए। कृषि विभाग के संचालक उमाशंकर भार्गव ने मैदानी अमले को निर्देश दिए हैं कि वे किसानों से लगातार संपर्क बनाए रखें और उन्हें मौसम की स्थिति के अनुसार खेती करने के लिए जागरूक करें। विभाग का कहना है कि पर्याप्त वर्षा होने तक धैर्य रखना किसानों के हित में होगा, क्योंकि जल्दबाजी भविष्य में दोबारा बुवाई जैसी समस्या पैदा कर सकती है।

पर्याप्त नमी होने पर ही करें खरीफ फसलों की बुवाई

कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि सफल अंकुरण और बेहतर फसल उत्पादन के लिए खेत में पर्याप्त नमी होना सबसे महत्वपूर्ण शर्त है। विशेषज्ञों के अनुसार, जब मिट्टी में लगभग चार इंच यानी एक बालिश्त की गहराई तक नमी पहुंच जाए और खेत में 'बतर' की स्थिति बन जाए, तभी बुवाई करनी चाहिए। यदि कम नमी वाली मिट्टी में बीज बो दिए जाएं, तो बीज ठीक तरह से अंकुरित नहीं हो पाते। 

इससे पौधों की संख्या कम हो जाती है और कई बार किसानों को दोबारा बीज खरीदकर पुनः बुवाई करनी पड़ती है, जिससे लागत बढ़ जाती है। इसलिए पहली हल्की बारिश के तुरंत बाद खेत में बीज डालने के बजाय मौसम की अगली बारिश का इंतजार करना अधिक सुरक्षित माना गया है। कृषि विभाग ने किसानों से मौसम विभाग के पूर्वानुमानों पर नजर रखने और स्थानीय कृषि अधिकारियों की सलाह के अनुसार ही बुवाई का निर्णय लेने की अपील की है।

सिंचाई सुविधा वाले किसान खेत की उर्वरता बढ़ाने पर दें ध्यान

जिन किसानों के पास सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है, उनके लिए यह समय खेत की गुणवत्ता सुधारने का सबसे अच्छा अवसर माना जा रहा है। कृषि विभाग ने सलाह दी है कि ऐसे किसान ढैंचा या सनई जैसी हरित खाद वाली फसलों की बुवाई करें। इन फसलों को बाद में मिट्टी में मिलाने से जैविक कार्बन बढ़ता है और मिट्टी की उर्वरता में सुधार होता है। 

इसके अलावा खेत तैयार करते समय गोबर की सड़ी खाद, वर्मी कम्पोस्ट, सिंगल सुपर फॉस्फेट, म्यूरेट ऑफ पोटाश, जिंक सल्फेट और जिप्सम का उपयोग मिट्टी परीक्षण की रिपोर्ट और कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार करना चाहिए। संतुलित पोषण मिलने से मिट्टी की जल धारण क्षमता बढ़ती है और पौधों की शुरुआती वृद्धि बेहतर होती है। इससे आने वाले पूरे सीजन में फसल अधिक स्वस्थ रहती है और उत्पादन में भी वृद्धि होती है।

सोयाबीन और धान की खेती में अपनाएं वैज्ञानिक तकनीक

कृषि विभाग ने सोयाबीन और धान की खेती करने वाले किसानों के लिए कुछ विशेष सुझाव भी जारी किए हैं। विभाग के अनुसार, सोयाबीन की बुवाई से पहले बीजों का अंकुरण परीक्षण अवश्य करना चाहिए और केवल ऐसे बीजों का उपयोग करना चाहिए जिनकी अंकुरण क्षमता कम से कम 70 प्रतिशत हो। इसके साथ ही रोग और कीट प्रतिरोधी तथा कम पानी में बेहतर उत्पादन देने वाली उन्नत किस्मों का चयन करना चाहिए। 

बुवाई से पहले बीजों का फफूंदनाशक और जैव उर्वरकों से उपचार करना भी बेहद आवश्यक है, ताकि शुरुआती अवस्था में बीज और पौधों को रोगों से सुरक्षा मिल सके। वहीं धान उत्पादक किसानों को पारंपरिक रोपाई के बजाय श्री पद्धति (SRI) या डायरेक्ट सीडेड राइस (DSR) तकनीक अपनाने की सलाह दी गई है। इन आधुनिक तकनीकों से पानी की बचत होती है, श्रम लागत कम होती है और कई क्षेत्रों में उत्पादन भी बेहतर प्राप्त होता है।

आधुनिक कृषि यंत्रों से कम होगा जोखिम और बढ़ेगी उत्पादकता

बदलते मौसम और अनिश्चित वर्षा को देखते हुए कृषि विभाग ने किसानों को आधुनिक कृषि यंत्रों का उपयोग बढ़ाने की सलाह दी है। विभाग के अनुसार रिज एंड फरो सीड ड्रिल, ब्रॉड बेड एंड फरो (BBF) सीड ड्रिल तथा हस्तचालित सीड डिब्लर जैसे उपकरणों का उपयोग करने से खेत में जल निकास बेहतर रहता है। 

यदि अधिक बारिश हो जाए तो पानी आसानी से निकल जाता है और यदि वर्षा कम हो तो नमी लंबे समय तक बनी रहती है। इससे सूखा और जलभराव दोनों परिस्थितियों में फसल को कम नुकसान होता है। आधुनिक यंत्रों से बीज की सही गहराई और उचित दूरी पर बुवाई होती है, जिससे पौधों की वृद्धि समान रूप से होती है और उत्पादन क्षमता बढ़ती है। साथ ही समय और श्रम दोनों की बचत होती है।

इंटरक्रॉपिंग और फसल बीमा से घटाएं खेती का जोखिम

मौसम की अनिश्चितता को देखते हुए कृषि विभाग ने किसानों को अंतरवर्ती खेती यानी इंटरक्रॉपिंग अपनाने की सलाह दी है। इस पद्धति में एक ही खेत में दो या दो से अधिक फसलों अथवा एक ही फसल की अलग-अलग किस्मों की खेती की जाती है। इससे यदि किसी एक फसल को मौसम, रोग या कीटों से नुकसान हो जाए, तो दूसरी फसल से किसानों को आय मिलती रहती है। 

इससे खेती का जोखिम काफी हद तक कम हो जाता है। विभाग ने किसानों को प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत अपनी खरीफ फसलों का बीमा कराने की भी सलाह दी है। प्राकृतिक आपदा, अत्यधिक वर्षा, सूखा या अन्य प्रतिकूल परिस्थितियों में फसल खराब होने पर बीमा योजना आर्थिक सुरक्षा प्रदान करती है और किसानों को नुकसान की भरपाई में मदद मिलती है।

वर्षा जल संचयन के साथ अपनाएं ये जरूरी सावधानियां

कृषि विभाग ने किसानों से वर्षा जल संचयन को खेती का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाने की अपील की है। खेत तालाब, पोखर, सोख्ता गड्ढे और कुओं में वर्षा जल का संग्रह भविष्य में सिंचाई के लिए बेहद उपयोगी साबित हो सकता है। वहीं जलभराव वाले क्षेत्रों से कुओं और नलकूपों को रिचार्ज करने से भूजल स्तर बनाए रखने में भी सहायता मिलती है। विभाग ने किसानों के लिए कुछ महत्वपूर्ण 'करें और न करें' भी जारी किए हैं।

किसानों को पर्याप्त नमी आने के बाद ही बुवाई करनी चाहिए, बीजोपचार और अंकुरण परीक्षण अवश्य करना चाहिए तथा कम अवधि वाली और स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल किस्मों का चयन करना चाहिए। दूसरी ओर पहली हल्की बारिश के तुरंत बाद बुवाई करने, बिना परीक्षण वाले बीजों का उपयोग करने, सूखी मिट्टी में बीज डालने और जल्दबाजी में पूरे खेत की बुवाई करने से बचना चाहिए। 

कृषि विभाग का मानना है कि यदि किसान वैज्ञानिक सलाह, मौसम पूर्वानुमान और आधुनिक तकनीकों का पालन करेंगे तो खरीफ सीजन में बेहतर अंकुरण, स्वस्थ फसल और अधिक उत्पादन प्राप्त कर सकेंगे।

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