देश के कई राज्यों में किसान इन दिनों धान की बुवाई और नर्सरी तैयार करने में जुटे हुए हैं। धान भारत की प्रमुख खाद्यान्न फसलों में से एक है, इसलिए इसकी अच्छी पैदावार किसानों की आय और खाद्य सुरक्षा दोनों के लिए बेहद महत्वपूर्ण होती है। लेकिन बदलते मौसम और बढ़ती नमी के कारण धान की फसल में कई प्रकार के कीट और रोगों का खतरा बढ़ जाता है।
इनमें तना छेदक कीट (स्टेम बोरर) सबसे अधिक नुकसान पहुंचाने वाले कीटों में शामिल है। यह कीट पौधे के तने के अंदर प्रवेश कर उसे भीतर से खोखला कर देता है, जिससे पौधा धीरे-धीरे सूख जाता है। यदि समय रहते इसका नियंत्रण नहीं किया जाए तो यह उत्पादन में भारी गिरावट का कारण बन सकता है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि धान की फसल की शुरुआत से ही किसानों को इस कीट की निगरानी और नियंत्रण के लिए सतर्क रहना चाहिए।
पिछले कुछ वर्षों में मौसम के स्वरूप में लगातार बदलाव देखने को मिल रहा है। कभी अधिक वर्षा तो कभी लंबे समय तक उमस और नमी का वातावरण, कीटों के विकास के लिए अनुकूल परिस्थितियां तैयार कर देता है। तना छेदक कीट भी ऐसे ही वातावरण में तेजी से फैलता है। विशेष रूप से धान की बुवाई के समय, कल्ले निकलने की अवस्था में और अगेती फसल में बालियां आने के दौरान इसका प्रकोप अधिक देखा जाता है।
यह कीट पौधों के तनों में छेद कर अंदर प्रवेश करता है और पौधे के पोषक तत्वों को नष्ट कर देता है। इसके कारण पौधे की वृद्धि रुक जाती है और कई बार पूरा खेत प्रभावित हो जाता है। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, यदि खेत में तना छेदक की संख्या बढ़ जाए तो उत्पादन में 20 से 30 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है।
किसानों के लिए सबसे जरूरी बात यह है कि वे समय रहते इस कीट की पहचान कर सकें। तना छेदक की मादा पतंगा हल्के पीले रंग की होती है, जिसके अग्रपंखों पर विशेष काले धब्बे या निशान दिखाई देते हैं। यही इसकी प्रमुख पहचान है। मादा पतंगा धान की पत्तियों के ऊपरी भाग पर समूह में अंडे देती है।
कुछ दिनों बाद इन अंडों से छोटे-छोटे लार्वा निकलते हैं, जो पत्तियों को काटते हुए पौधे के तने के अंदर प्रवेश कर जाते हैं। इसके बाद वे तने के अंदर ही भोजन करते हुए तेजी से बढ़ते हैं। प्रभावित पौधे पहले पीले पड़ते हैं और बाद में भूरे होकर सूख जाते हैं। कई बार खेत में सूखी हुई पत्तियां और सफेद बालियां दिखाई देने लगती हैं, जो तना छेदक के प्रकोप का स्पष्ट संकेत होती हैं।
कृषि विज्ञान केंद्र के प्रभारी डॉ. आई.के. कुशवाहा के अनुसार तना छेदक कीट अक्सर धान की नर्सरी से मुख्य खेत तक पहुंचता है। कई किसान नर्सरी तैयार करने के बाद सीधे पौधों की रोपाई कर देते हैं, जिससे नर्सरी में मौजूद कीट और उनके अंडे भी खेत में पहुंच जाते हैं। यही कारण है कि रोपाई से पहले पौधों की अच्छी तरह जांच करना बेहद आवश्यक है।
विशेषज्ञ बताते हैं कि नर्सरी के पौधों की पत्तियों पर रुई जैसी संरचना दिखाई देती है, जिसके भीतर तना छेदक के अंडे मौजूद हो सकते हैं। यदि इन अंडों को समय रहते नष्ट नहीं किया गया तो रोपाई के बाद पूरे खेत में कीट का तेजी से फैलाव हो सकता है। इसलिए किसानों को रोपाई से पहले नर्सरी की सावधानीपूर्वक निगरानी करनी चाहिए।
तना छेदक की रोकथाम के लिए कृषि विशेषज्ञ एक बेहद सरल लेकिन प्रभावी उपाय अपनाने की सलाह देते हैं। रोपाई से पहले धान के पौधों का लगभग एक-तिहाई ऊपरी हिस्सा काटकर हटा देना चाहिए। ऐसा करने से पत्तियों पर मौजूद अंडे और लार्वा नष्ट हो जाते हैं तथा वे मुख्य खेत तक नहीं पहुंच पाते। यह उपाय रासायनिक दवाओं के उपयोग को कम करने के साथ-साथ पर्यावरण के लिए भी सुरक्षित माना जाता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि सभी किसान रोपाई से पहले यह प्रक्रिया अपनाएं तो तना छेदक के प्रकोप को शुरुआती स्तर पर ही काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। इसके अलावा खेत की नियमित निगरानी भी आवश्यक है ताकि किसी भी प्रकार के संक्रमण का समय रहते पता लगाया जा सके।
धान की फसल को तना छेदक से बचाने के लिए केवल रासायनिक उपायों पर निर्भर रहना जरूरी नहीं है। कई जैविक और यांत्रिक तकनीकें भी इस कीट के नियंत्रण में काफी प्रभावी साबित होती हैं। किसानों को खेतों में लाइट ट्रैप लगाने चाहिए, जिससे रात के समय उड़ने वाले कीट प्रकाश की ओर आकर्षित होकर नष्ट हो जाते हैं।
इसके अलावा नीम के तेल का छिड़काव भी कीट नियंत्रण का एक सुरक्षित और पर्यावरण अनुकूल तरीका है। फेरोमोन ट्रैप का उपयोग करने से नर कीट आकर्षित होकर फंस जाते हैं, जिससे उनकी संख्या कम होती है और प्रजनन चक्र प्रभावित होता है। वहीं ट्राइको कार्ड से निकलने वाले मित्र कीट तना छेदक के अंडों को नष्ट कर देते हैं। इन उपायों के प्रयोग से रासायनिक दवाओं की आवश्यकता कम हो जाती है और फसल भी सुरक्षित रहती है।
डॉ. आई.के. कुशवाहा के अनुसार धान की रोपाई के लगभग एक महीने बाद किसानों को प्रति एकड़ खेत में छह फेरोमोन ट्रैप और दो ट्राइको कार्ड लगाने चाहिए। इन ट्राइको कार्डों को 10-10 दिन के अंतराल पर बदलते रहना चाहिए ताकि मित्र कीट लगातार सक्रिय बने रहें। फेरोमोन ट्रैप विशेष गंध के माध्यम से नर कीटों को आकर्षित करते हैं, जिससे उनका प्रजनन कम हो जाता है।
दूसरी ओर ट्राइको कार्ड से निकलने वाले परजीवी कीट तना छेदक के अंडों पर हमला कर उन्हें नष्ट कर देते हैं। यह एक वैज्ञानिक और टिकाऊ समाधान है, जो लंबे समय तक फसल को सुरक्षित रखने में मदद करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसान नियमित निगरानी, नर्सरी प्रबंधन, जैविक नियंत्रण और फेरोमोन ट्रैप जैसी तकनीकों का सही तरीके से उपयोग करें, तो तना छेदक कीट से होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है और धान की बेहतर उपज प्राप्त की जा सकती है।
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