खरीफ सीजन में मूंगफली किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण नकदी फसल मानी जाती है। इसकी खेती मुख्य रूप से जून से जुलाई के बीच की जाती है, जब मानसून की शुरुआत हो जाती है और मिट्टी में पर्याप्त नमी उपलब्ध रहती है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार मूंगफली की बुवाई मध्य जून से लेकर जुलाई के पहले या दूसरे सप्ताह तक पूरी कर लेनी चाहिए।
समय पर बुवाई करने से पौधों का विकास बेहतर होता है और उत्पादन में वृद्धि होती है। हालांकि कुछ किसान जुलाई के दूसरे सप्ताह के बाद भी बुवाई करते हैं, लेकिन देर से बोई गई फसल में पैदावार घटने का जोखिम बढ़ जाता है। यदि किसान वैज्ञानिक तरीकों को अपनाकर खेती करें तो मूंगफली से बेहतर उत्पादन के साथ अधिक लाभ भी प्राप्त किया जा सकता है।
मूंगफली की अच्छी फसल के लिए ऐसी भूमि का चयन करना चाहिए जहां जल निकासी की उचित व्यवस्था हो। हल्की रेतीली दोमट अथवा रेतीली चिकनी दोमट मिट्टी इसकी खेती के लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती है।
मिट्टी का pH मान 5.5 से 7.0 के बीच होना चाहिए। खेत की तैयारी के दौरान गर्मियों में गहरी जुताई करना लाभदायक रहता है, क्योंकि इससे मिट्टी में मौजूद कीटों, रोगजनकों और खरपतवारों के बीजों का नाश हो जाता है। बुवाई से पहले खेत को भुरभुरा और समतल बनाना आवश्यक है ताकि बीजों का अंकुरण समान रूप से हो सके।
उच्च उत्पादन प्राप्त करने के लिए हमेशा प्रमाणित और अच्छी गुणवत्ता वाले बीजों का ही चयन करना चाहिए। बुवाई से पहले बीजों का उपचार करना आवश्यक है, जिससे फसल को शुरुआती अवस्था में रोगों और कीटों से सुरक्षा मिल सके। बीजों को कार्बोक्सिन 37.5 प्रतिशत + थायरम 37.5 प्रतिशत डीएस की 2 से 3 ग्राम मात्रा प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित किया जा सकता है।
दीमक और सफेद लट जैसे कीटों से बचाव के लिए इमिडाक्लोप्रिड 600 एफएस का 6.5 मिली प्रति किलोग्राम बीज की दर से प्रयोग किया जाता है। इसके बाद बीजों को राइजोबियम और पीएसबी कल्चर से उपचारित करने पर पौधों को नाइट्रोजन स्थिरीकरण और फास्फोरस उपलब्धता में लाभ मिलता है।
मूंगफली की अधिक उपज के लिए वैज्ञानिक बुवाई पद्धतियों को अपनाना चाहिए। क्रिस-क्रॉस बुवाई, ब्रॉड बेड एवं फरो (BBF) तथा रिज एवं फरो विधि अधिक उत्पादन देने वाली तकनीकों में शामिल हैं। गुच्छेदार किस्मों के लिए 30 सेंटीमीटर × 10 सेंटीमीटर की दूरी रखना उपयुक्त माना जाता है और इसके लिए लगभग 100 से 110 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की आवश्यकता होती है।
वहीं अर्ध-फैलने वाली और फैलने वाली किस्मों के लिए 40 से 45 सेंटीमीटर × 10 सेंटीमीटर अथवा 30 सेंटीमीटर × 15 सेंटीमीटर की दूरी रखनी चाहिए। इन किस्मों में बीज दर किस्म और दानों के आकार के अनुसार लगभग 100 से 210 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर तक हो सकती है।
मूंगफली की अच्छी पैदावार के लिए संतुलित पोषण प्रबंधन अत्यंत आवश्यक है। बुवाई से लगभग तीन से चार सप्ताह पहले प्रति हेक्टेयर 10 टन अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद खेत में मिलानी चाहिए। इसके अलावा मिट्टी परीक्षण के आधार पर नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश की अनुशंसित मात्रा का प्रयोग करना चाहिए।
मूंगफली में कैल्शियम और सल्फर का विशेष महत्व होता है, इसलिए बुवाई के समय प्रति हेक्टेयर लगभग 500 किलोग्राम जिप्सम का प्रयोग लाभदायक माना जाता है। इससे फलियों का विकास बेहतर होता है और दानों की गुणवत्ता भी सुधरती है।
मूंगफली की फसल के शुरुआती 35 दिन खरपतवार प्रबंधन के लिए सबसे महत्वपूर्ण माने जाते हैं। यदि इस अवधि में खरपतवारों को नियंत्रित नहीं किया गया तो उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
सामान्यतः 20 से 25 दिन और 35 से 40 दिन बाद दो बार हाथ से निराई-गुड़ाई करने की सलाह दी जाती है। रासायनिक नियंत्रण के लिए बुवाई के दो दिनों के भीतर डिक्लोसुलम 84 प्रतिशत डब्ल्यूडीजी की 20 से 25 ग्राम मात्रा प्रति हेक्टेयर या पेंडीमेथालिन + इमाजेथापायर 32 ईसी का उपयोग किया जा सकता है। बाद की अवस्थाओं में खरपतवार नियंत्रण के लिए क्विज़ालोफॉप एथिल अथवा इमाजेथापायर का प्रयोग भी प्रभावी पाया गया है।
मूंगफली की फसल में फूल आने, फली बनने और दाना भरने की अवस्थाएं सबसे संवेदनशील मानी जाती हैं। सामान्यतः बुवाई के 20 से 40 दिन, 40 से 70 दिन तथा 70 से 100 दिन के बीच पौधों को पर्याप्त नमी की आवश्यकता होती है।
इन चरणों में नमी की कमी होने पर उत्पादन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए सिंचाई की उचित व्यवस्था बनाए रखना जरूरी है। आधुनिक ड्रिप सिंचाई प्रणाली अपनाने से न केवल 40 से 50 प्रतिशत तक पानी की बचत होती है, बल्कि उत्पादन में 25 से 40 प्रतिशत तक वृद्धि भी देखी गई है।
मूंगफली की फसल में सफेद लट, तंबाकू इल्ली, ग्राम पॉड बोरर, रेड हेयरी कैटरपिलर, लीफ माइनर, एफिड, जैसिड और थ्रिप्स जैसे कीट नुकसान पहुंचा सकते हैं।
इनके नियंत्रण के लिए नियमित निगरानी और आवश्यकता अनुसार अनुशंसित कीटनाशकों का उपयोग करना चाहिए। वहीं एस्परजिलस सीडलिंग ब्लाइट, कॉलर रॉट, लीफ स्पॉट, रस्ट और स्टेम रॉट जैसे रोग भी फसल को प्रभावित कर सकते हैं। इन रोगों से बचाव के लिए रोग प्रतिरोधी किस्मों का चयन, बीज उपचार तथा आवश्यकता पड़ने पर उपयुक्त फफूंदनाशकों का प्रयोग करना चाहिए।
मूंगफली की खेती में समय पर बुवाई, प्रमाणित बीजों का उपयोग, संतुलित उर्वरक प्रबंधन, खरपतवार नियंत्रण, उचित सिंचाई और कीट-रोग प्रबंधन जैसे उपाय अपनाकर किसान उत्पादन और गुणवत्ता दोनों में सुधार कर सकते हैं।
वैज्ञानिक खेती की तकनीकों को अपनाने से न केवल लागत पर नियंत्रण रखा जा सकता है, बल्कि प्रति हेक्टेयर उपज बढ़ाकर अधिक मुनाफा भी कमाया जा सकता है। खरीफ सीजन में मूंगफली किसानों के लिए आय बढ़ाने वाली एक महत्वपूर्ण फसल साबित हो सकती है।
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