वैज्ञानिकों ने विकसित की सूखा में भी बेहतर पैदावार देने वाली धान की उन्नत किस्म

By : Tractorbird Published on : 28-Jun-2026
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जलवायु परिवर्तन के दौर में किसानों के लिए नई उम्मीद

भारत में जलवायु परिवर्तन का प्रभाव कृषि क्षेत्र पर लगातार बढ़ता जा रहा है। अनियमित मानसून, लंबे सूखे की अवधि और भूजल स्तर में गिरावट ने धान उत्पादक किसानों की चिंताओं को बढ़ा दिया है। विशेष रूप से बासमती धान उगाने वाले क्षेत्रों में पानी की कमी एक गंभीर समस्या बन चुकी है, जिससे उत्पादन और किसानों की आय दोनों प्रभावित हो रही हैं। 

ऐसे चुनौतीपूर्ण समय में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई), पूसा द्वारा विकसित पूसा बासमती 1882 किसानों के लिए नई उम्मीद लेकर आई है। यह भारत की पहली मास-व्युत्पन्न (MAS-Derived) सूखा-सहनशील बासमती धान किस्म है, जिसे जल संकट और बदलती जलवायु परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए विकसित किया गया है। यह किस्म कम पानी की उपलब्धता के बावजूद बेहतर उत्पादन देने में सक्षम है और किसानों को जोखिम कम करने का अवसर प्रदान करती है।

वैज्ञानिक अनुसंधान से विकसित आधुनिक बासमती किस्म

पूसा बासमती 1882 को अत्याधुनिक कृषि जैव प्रौद्योगिकी और पौध प्रजनन तकनीकों की मदद से विकसित किया गया है। यह लोकप्रिय किस्म पूसा बासमती-1 का उन्नत संस्करण है, जिसमें वैज्ञानिकों ने विशेष रूप से qDTY 1.1 नामक QTL (Quantitative Trait Locus) जीन को शामिल किया है। यह जीन फसल को सूखे की स्थिति में भी जीवित रहने और बेहतर उत्पादन बनाए रखने में मदद करता है। 

जब पौधा प्रजनन अवस्था में पहुंचता है और पानी की कमी का सामना करता है, तब यह जीन सक्रिय होकर पौधे की वृद्धि और दानों के विकास को प्रभावित होने से बचाता है। यही कारण है कि यह किस्म सामान्य बासमती किस्मों की तुलना में सूखे के दौरान अधिक स्थिर उत्पादन देने में सक्षम है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह तकनीक भविष्य की जलवायु चुनौतियों से निपटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

किन राज्यों के किसानों के लिए उपयुक्त है यह किस्म ?

पूसा बासमती 1882 को विशेष रूप से उत्तर और उत्तर-पश्चिम भारत के पारंपरिक बासमती उत्पादक क्षेत्रों के लिए विकसित किया गया है। यह किस्म दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों के लिए अनुशंसित की गई है। इन राज्यों में बासमती धान का उत्पादन बड़े पैमाने पर किया जाता है और यहां जल संकट की समस्या भी तेजी से बढ़ रही है। 

इस नई किस्म की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह कम पानी की उपलब्धता में भी अच्छी पैदावार देने में सक्षम है। इसलिए जिन क्षेत्रों में सिंचाई के संसाधन सीमित हैं या जहां मानसून पर अधिक निर्भरता रहती है, वहां के किसानों के लिए यह किस्म विशेष रूप से लाभकारी साबित हो सकती है।

फसल अवधि और उत्पादन क्षमता

पूसा बासमती 1882 खरीफ मौसम में उगाई जाने वाली धान की एक उन्नत किस्म है। इसकी पकने की अवधि लगभग 135 दिन है, जो किसानों को समय पर फसल तैयार करने में मदद करती है। इस किस्म की औसत उपज लगभग 46.9 क्विंटल प्रति हेक्टेयर दर्ज की गई है, जबकि अनुकूल परिस्थितियों और बेहतर प्रबंधन के साथ यह 59.7 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन देने की क्षमता रखती है। 

कम अवधि में तैयार होने के कारण किसान अगली फसल की बुवाई भी समय पर कर सकते हैं, जिससे फसल चक्र बेहतर बनता है। इसके अलावा, अधिक उत्पादन क्षमता किसानों की आय बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है और कृषि को अधिक लाभदायक बनाती है।

सूखे की परिस्थितियों में शानदार प्रदर्शन

पूसा बासमती 1882 किस्म की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इसका सूखा-सहनशील होना है। वैज्ञानिकों ने इसके प्रदर्शन का परीक्षण विशेष रेन आउट शेल्टर में किया, जहां कृत्रिम रूप से सूखे जैसी परिस्थितियां बनाई गई थीं। परीक्षण के दौरान पारंपरिक पूसा बासमती-1 की पैदावार लगभग 496 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर रही, जबकि पूसा बासमती 1882 ने 987.5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर उत्पादन दर्ज किया। 

यह लगभग दोगुना उत्पादन है, जो इसकी सूखा-सहनशील क्षमता को स्पष्ट रूप से दर्शाता है। ऐसे परिणाम बताते हैं कि यदि फसल के महत्वपूर्ण विकास चरण में पानी की कमी हो जाए, तब भी यह किस्म किसानों को बेहतर उत्पादन देने में सक्षम है और नुकसान को काफी हद तक कम कर सकती है।

सामान्य सिंचित परिस्थितियों में भी बेहतर उपज

केवल सूखे की स्थिति में ही नहीं, बल्कि सामान्य सिंचित परिस्थितियों में भी पूसा बासमती 1882 ने बेहतरीन प्रदर्शन किया है। अनुसंधान परिणामों के अनुसार यह किस्म अपनी मूल किस्म पूसा बासमती-1 की तुलना में लगभग 10.26 प्रतिशत अधिक उपज देती है। 

इसका अर्थ है कि जिन किसानों के पास पर्याप्त सिंचाई सुविधा उपलब्ध है, वे भी इस किस्म को अपनाकर अधिक उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं। यह दोहरा लाभ इसे अन्य बासमती किस्मों से अलग बनाता है। जहां एक ओर यह जल संकट के समय उत्पादन को सुरक्षित रखती है, वहीं दूसरी ओर सामान्य परिस्थितियों में भी किसानों को अतिरिक्त आय प्रदान करती है।

किसानों की लागत कम करने में सहायक

वर्तमान समय में कृषि लागत लगातार बढ़ रही है। सिंचाई, बिजली, डीजल और श्रम पर होने वाला खर्च किसानों के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। पूसा बासमती 1882 की खासियत यह है कि यह कम पानी में भी अच्छा प्रदर्शन करती है, जिससे सिंचाई पर होने वाला खर्च कम हो सकता है। 

इसके अलावा, सूखे के कारण फसल खराब होने का जोखिम भी कम हो जाता है। कम जोखिम और बेहतर उत्पादन के कारण किसानों को आर्थिक सुरक्षा मिलती है। यदि मौसम प्रतिकूल भी हो जाए, तो यह किस्म उत्पादन को काफी हद तक सुरक्षित रखने में मदद करती है। इससे किसानों की लागत और जोखिम दोनों कम होते हैं तथा लाभ की संभावना बढ़ जाती है।

भविष्य की टिकाऊ कृषि के लिए महत्वपूर्ण कदम

विशेषज्ञों का मानना है कि पूसा बासमती 1882 आने वाले वर्षों में भारत के बासमती उत्पादन को स्थिरता प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। बढ़ते जल संकट और जलवायु परिवर्तन के दौर में ऐसी किस्मों की आवश्यकता लगातार बढ़ रही है जो कम संसाधनों में अधिक उत्पादन दे सकें। 

यह किस्म न केवल किसानों की आय बढ़ाने में मदद करेगी बल्कि जल संरक्षण और टिकाऊ कृषि को भी बढ़ावा देगी। यदि अधिक से अधिक किसान इस उन्नत बासमती किस्म को अपनाते हैं, तो देश के बासमती उत्पादन और निर्यात दोनों को मजबूती मिलेगी। इस प्रकार पूसा बासमती 1882 केवल एक नई धान किस्म नहीं, बल्कि भविष्य की कृषि चुनौतियों का वैज्ञानिक समाधान भी है।

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