धान की फसल में राइस ड्वार्फ (Rice Dwarf) बीमारी के मामले सामने आने के बाद कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को सतर्क रहने की सलाह दी है। पंजाब एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी (PAU) और फिरोजपुर कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) के विशेषज्ञों ने विभिन्न क्षेत्रों में धान के खेतों का सर्वे करने के बाद किसानों को बीमारी की समय रहते पहचान और प्रभावी प्रबंधन के लिए जागरूक किया है।
वैज्ञानिकों के अनुसार यह वायरस जनित रोग है, जो फसल को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है। यदि शुरुआती चरण में बीमारी की पहचान नहीं की गई और इसके प्रसार को रोकने के उपाय नहीं किए गए तो उत्पादन में काफी गिरावट आने की आशंका रहती है। विशेषज्ञों ने किसानों से अपील की है कि वे अपने खेतों की नियमित निगरानी करें और किसी भी संदिग्ध लक्षण को नजरअंदाज न करें।
फिरोजपुर कृषि विज्ञान केंद्र की टीम ने डिप्टी डायरेक्टर डॉ. गुरमेल सिंह संधू के नेतृत्व में कई गांवों का दौरा कर धान की फसल का निरीक्षण किया। इस दौरान विशेषज्ञों ने खेतों में बीमारी और कीट की स्थिति का जायजा लिया तथा किसानों को इसके लक्षणों और बचाव के वैज्ञानिक तरीकों की जानकारी दी। विशेषज्ञों का कहना है कि किसानों को फसल की स्थिति पर लगातार नजर रखनी चाहिए।
सप्ताह में कम से कम एक बार खेत का निरीक्षण करना जरूरी है। यदि पौधों में असामान्य वृद्धि, पत्तियों के आकार में बदलाव या किसी कीट की मौजूदगी दिखाई देती है तो तुरंत कृषि विशेषज्ञों से सलाह लेनी चाहिए। वैज्ञानिकों ने यह भी स्पष्ट किया कि किसान अपनी ओर से किसी भी कीटनाशक का अंधाधुंध इस्तेमाल न करें।
असिस्टेंट प्रोफेसर प्लांट प्रोटेक्शन डॉ. हरविंदर सिंह बटर के अनुसार राइस ड्वार्फ बीमारी वायरस के कारण होती है। संक्रमित पौधों की वृद्धि सामान्य पौधों की तुलना में काफी कम रह जाती है और वे बौने दिखाई देने लगते हैं। बीमारी के प्रभाव से पत्तियां पतली और नुकीली हो सकती हैं, जबकि पौधों की जड़ों का विकास भी प्रभावित होता है।
संक्रमण अधिक गंभीर होने पर पौधों में बालियां ठीक से विकसित नहीं हो पातीं और दानों का निर्माण प्रभावित हो सकता है। कुछ मामलों में संक्रमित पौधे धीरे-धीरे सूख भी जाते हैं। इससे खेत में पौधों की संख्या और उत्पादकता दोनों प्रभावित होती हैं तथा किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।
विशेषज्ञों के मुताबिक राइस ड्वार्फ बीमारी का वायरस व्हाइट-बैक्ड प्लांट हॉपर नामक कीट के माध्यम से फैलता है। इसलिए बीमारी की रोकथाम के लिए इस कीट की पहचान और समय पर निगरानी बेहद महत्वपूर्ण है। वैज्ञानिकों के अनुसार इस कीट के निम्फ शुरुआती अवस्था में हल्के भूरे या सफेद रंग के दिखाई दे सकते हैं।
विकसित होने पर इनका रंग गहरा भूरा हो जाता है। वयस्क कीट की पहचान उसकी पीठ पर बनी पतली सफेद पट्टी और अगले पंखों के पिछले हिस्से पर मौजूद काले धब्बों से की जा सकती है। खेत में इस कीट की मौजूदगी बढ़ने पर वायरस के फैलाव का खतरा भी बढ़ सकता है, इसलिए किसान नियमित रूप से फसल की जांच करते रहें।
कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को व्हाइट-बैक्ड प्लांट हॉपर की पहचान के लिए आसान तरीका भी बताया है। किसान धान के पौधों को हल्के से झुकाकर दो से तीन बार हिला सकते हैं। यदि खेत में जमा पानी की सतह पर छोटे निम्फ या वयस्क कीट तैरते या तेजी से चलते हुए दिखाई दें तो यह कीट की मौजूदगी का संकेत हो सकता है।
हालांकि केवल कीट दिखाई देने पर तुरंत कीटनाशक का छिड़काव करने से बचना चाहिए। विशेषज्ञों ने सलाह दी है कि कीटों की संख्या आर्थिक क्षति स्तर यानी थ्रेशोल्ड लेवल तक पहुंचने पर ही विश्वविद्यालय या कृषि विभाग की अनुशंसित दवाओं का इस्तेमाल किया जाए। अनावश्यक कीटनाशक के प्रयोग से लागत बढ़ने के साथ मित्र कीटों को भी नुकसान पहुंच सकता है।
विशेषज्ञों ने किसानों को कीटों की निगरानी के लिए रात के समय खेतों के आसपास लाइट बल्ब लगाने की सलाह दी है। व्हाइट-बैक्ड प्लांट हॉपर रोशनी की ओर आकर्षित होते हैं, जिससे उनकी मौजूदगी का पता लगाने में मदद मिल सकती है। इसके अलावा यदि किसी पौधे में बीमारी के स्पष्ट लक्षण दिखाई दें तो उसे शुरुआती अवस्था में ही खेत से निकालकर गहराई में दबा देना चाहिए।
इससे संक्रमित पौधों से वायरस के दूसरे पौधों तक पहुंचने की संभावना कम की जा सकती है। किसानों को खेत की मेड़ों और सिंचाई नालियों को भी खरपतवार मुक्त रखने की सलाह दी गई है, क्योंकि साफ-सफाई और बेहतर खेत प्रबंधन से कीटों के छिपने और बढ़ने के स्थान कम किए जा सकते हैं।
कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को उर्वरकों के इस्तेमाल में भी सावधानी बरतने की सलाह दी है। खासकर नाइट्रोजन उर्वरक का प्रयोग अनुशंसित मात्रा के अनुसार ही किया जाना चाहिए। जरूरत से ज्यादा नाइट्रोजन देने से फसल का अत्यधिक कोमल और हरा विकास हो सकता है, जिससे कुछ कीटों का प्रकोप बढ़ने की आशंका रहती है।
जिन खेतों में पिछले वर्ष राइस ड्वार्फ या संबंधित कीट की समस्या सामने आई थी, वहां किसानों को इस सीजन में विशेष निगरानी रखने की जरूरत है। ऐसे खेतों में फसल की नियमित जांच, संदिग्ध पौधों की पहचान और समय पर विशेषज्ञों से सलाह लेना बेहद जरूरी है। इससे बीमारी के शुरुआती प्रसार को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।
कृषि वैज्ञानिकों का कहना है, कि राइस ड्वार्फ बीमारी से फसल को बचाने के लिए किसानों की सतर्कता सबसे महत्वपूर्ण है। खेतों की नियमित निगरानी, संक्रमित पौधों को समय पर हटाना और व्हाइट-बैक्ड प्लांट हॉपर की आबादी को नियंत्रित रखना बीमारी के प्रसार को रोकने में अहम भूमिका निभा सकता है। किसानों को बिना विशेषज्ञ सलाह के किसी भी कीटनाशक का छिड़काव नहीं करना चाहिए।
यदि फसल में बीमारी के शुरुआती लक्षण दिखाई देते हैं या कीटों की संख्या बढ़ती नजर आती है तो तुरंत कृषि विज्ञान केंद्र, कृषि विभाग या कृषि विशेषज्ञों से संपर्क करना चाहिए। वैज्ञानिकों के अनुसार समय पर पहचान और अनुशंसित प्रबंधन उपाय अपनाकर किसान धान की फसल को संभावित बड़े नुकसान से बचा सकते हैं और उत्पादन को सुरक्षित रखने की दिशा में प्रभावी कदम उठा सकते हैं।
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