तिल भारत की प्रमुख तिलहनी फसलों में से एक है। इसके बीजों से प्राप्त तेल का उपयोग खाद्य पदार्थों के साथ-साथ विभिन्न औद्योगिक कार्यों में भी किया जाता है। देश में उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात तिल उत्पादन वाले प्रमुख राज्यों में शामिल हैं। तिल की फसल को सामान्यतः कम पानी की आवश्यकता होती है और इसकी खेती विभिन्न प्रकार की मिट्टी में की जा सकती है।
हालांकि, मौसम में बदलाव, अधिक नमी, संक्रमित बीज और खेत में उचित प्रबंधन की कमी के कारण तिल की फसल में कई तरह के रोग लग सकते हैं। इन रोगों के कारण पौधों की वृद्धि प्रभावित होती है और उत्पादन में भारी कमी आ सकती है। इसलिए समय रहते रोग की पहचान कर उचित नियंत्रण उपाय अपनाना किसानों के लिए बेहद जरूरी है।
अल्टरनेरिया पत्ती धब्बा तिल की फसल में होने वाला एक प्रमुख रोग है। इसके प्रकोप की शुरुआत पत्तियों से होती है। संक्रमित पत्तियों पर छोटे, गोलाकार लाल-भूरे धब्बे दिखाई देते हैं, जिनमें धीरे-धीरे संकेंद्रित वलय बनने लगते हैं।
रोग बढ़ने पर इसके लक्षण पत्तियों के अलावा डंठल, तने और कैप्सूल पर भी दिखाई देने लगते हैं। पत्तियों पर बने धब्बे बड़े होकर उन्हें झुलसा सकते हैं, जिससे पत्तियां समय से पहले गिरने लगती हैं। कैप्सूल पर संक्रमण होने की स्थिति में बीज सिकुड़ सकते हैं और फलियां समय से पहले फटने लगती हैं।
फायलोडी तिल की फसल का एक गंभीर रोग है। यह रोग माइकोप्लाज्मा जैसे रोगजनक से संबंधित होता है और इसके कारण पौधे के फूलों के सामान्य अंग पत्तियों जैसी संरचना में बदलने लगते हैं।
रोगग्रस्त पौधों की पत्तियां छोटी और गुच्छेदार दिखाई देती हैं। पौधे की सामान्य वृद्धि रुक जाती है और फूलों तथा बीजों का विकास प्रभावित होता है। यह रोग मुख्य रूप से जैसिड जैसे कीट वाहकों के माध्यम से एक पौधे से दूसरे पौधे तक फैल सकता है।
रोग फैलाने वाले कीट वाहक को नियंत्रित करना सबसे महत्वपूर्ण उपाय है।
NSKE 5% या नीम तेल 2% का छिड़काव किया जा सकता है।
बुवाई से पहले इमिडाक्लोप्रिड 600 FS @ 7.5 मिलीलीटर प्रति किलोग्राम बीज की दर से बीज उपचार करें।
खड़ी फसल में रोग फैलाने वाले कीटों की रोकथाम के लिए अनुशंसित कीटनाशक का उपयोग करें, जैसे क्विनालफोस 25 EC @ 800 मिलीलीटर प्रति एकड़, थायमेथोक्साम 25 WG @ 40 ग्राम प्रति एकड़ या इमिडाक्लोप्रिड 17.8 SL @ 40 मिलीलीटर प्रति एकड़।
खेत में रोगग्रस्त पौधे दिखाई देने पर उन्हें निकालकर नष्ट करना भी उपयोगी उपाय है।
तिल के साथ अरहर की सहफसली खेती करने से भी रोग के प्रसार को कम करने में मदद मिल सकती है।
जड़ गलन रोग का असर तिल के पौधों की जड़ों पर पड़ता है। इसके शुरुआती लक्षण पुरानी पत्तियों पर दिखाई देते हैं। रोगग्रस्त पौधों की पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं और बाद में गिर जाती हैं।
रोग बढ़ने पर पौधे की जड़ें सड़कर कमजोर हो जाती हैं। जड़ों के गल जाने के कारण संक्रमित पौधे मिट्टी से आसानी से बाहर निकल जाते हैं। ऐसे पौधों में फलियां समय से पहले खुल सकती हैं, जिससे उपज और बीज की गुणवत्ता प्रभावित होती है।
जिन खेतों में इस रोग का लगातार प्रकोप रहता है, वहां कुछ समय तक तिल की खेती न करें।
खेत में जल निकास की उचित व्यवस्था रखें, ताकि पानी जमा न हो।
फसल की बुवाई उचित समय पर करें।
रोगग्रस्त पौधों को खेत से निकालकर नष्ट करें।
उपलब्ध कृषि अनुशंसाओं के अनुसार कार्बेन्डाजिम 50 WP @ 1 ग्राम प्रति लीटर पानी का घोल जड़ों के आसपास डालकर उपचार किया जा सकता है।
पाउडरी मिल्ड्यू एक कवकजनित रोग है। इसका प्रकोप मुख्य रूप से तिल की पत्तियों पर दिखाई देता है। संक्रमित पत्तियों की ऊपरी सतह पर सफेद रंग का पाउडर जैसा चूर्ण दिखाई देता है।
यह रोग सामान्यतः फसल में लगभग 45 दिन की अवस्था से लेकर पकने तक दिखाई दे सकता है। अधिक संक्रमण होने पर पत्तियों की प्रकाश संश्लेषण क्षमता प्रभावित होती है और पौधे की वृद्धि तथा उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
खेत की नियमित निगरानी करें और शुरुआती अवस्था में रोग की पहचान करें।
रोग के नियंत्रण के लिए वेटेबल सल्फर 80 WP @ 500 ग्राम प्रति एकड़ का छिड़काव किया जा सकता है।
आवश्यकता पड़ने पर कृषि विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार लगभग 15 दिन के अंतराल पर दोबारा उपचार करें।
सल्फर डस्ट 10 किलोग्राम प्रति एकड़ की दर से भी उपयोग किया जा सकता है।
फाइटोफ्थोरा अंगमारी तिल की फसल को प्रभावित करने वाला एक गंभीर रोग है। यह रोग Phytophthora parasitica जैसे रोगजनक से जुड़ा हुआ है और पौधे की विभिन्न अवस्थाओं में दिखाई दे सकता है।
रोग की शुरुआत में पत्तियों और तनों पर छोटे भूरे, सूखे धब्बे दिखाई देते हैं। समय के साथ ये धब्बे फैलकर बड़े हो जाते हैं और पत्तियां झुलसने लगती हैं। बाद में प्रभावित भागों का रंग गहरा या काला दिखाई दे सकता है। संक्रमण अधिक बढ़ने पर पूरा पौधा सूखकर मर सकता है।
एक ही खेत में लगातार तिल की खेती करने से बचें।
खेत में पानी के उचित निकास की व्यवस्था रखें।
रोगग्रस्त पौधों को समय पर खेत से हटाएं।
रोग के लक्षण दिखाई देने पर कृषि विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार उपयुक्त फफूंदनाशी का प्रयोग करें।
दिए गए प्रबंधन के अनुसार रिडोमिल 5 ग्राम प्रति लीटर पानी का घोल बनाकर लगभग 10 दिन के अंतराल पर छिड़काव किया जा सकता है।
तिल में रोगों का प्रकोप कम करने के लिए केवल रोग दिखाई देने के बाद उपचार करना पर्याप्त नहीं है। किसान शुरुआत से ही फसल का सही प्रबंधन करें तो कई रोगों को नियंत्रित किया जा सकता है।
रोग की पहचान होने पर कृषि विशेषज्ञ या स्थानीय कृषि विभाग की सलाह के अनुसार ही रसायनों का प्रयोग करें।
किसी भी कीटनाशक या फफूंदनाशी का इस्तेमाल करते समय उसके लेबल पर दी गई मात्रा, फसल और सुरक्षा निर्देशों का पालन करें।
तिल की फसल में अल्टरनेरिया पत्ती धब्बा, फायलोडी, जड़ गलन, पाउडरी मिल्ड्यू और फाइटोफ्थोरा अंगमारी जैसे रोग उत्पादन को प्रभावित कर सकते हैं। इन रोगों की समय पर पहचान, स्वस्थ बीज का चयन, बीज उपचार, फसल चक्र, उचित जल निकास और आवश्यकता के अनुसार फफूंदनाशी एवं कीट नियंत्रण उपाय अपनाकर फसल को काफी हद तक सुरक्षित रखा जा सकता है।
इसलिए किसानों को फसल की नियमित निगरानी करनी चाहिए और रोग के शुरुआती लक्षण दिखाई देते ही उचित प्रबंधन उपाय अपनाने चाहिए। इससे फसल की गुणवत्ता और उत्पादन को बेहतर बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
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