मानसून 2026: अल नीनो–ला नीना चक्र और भारतीय मौसम विभाग की चेतावनी

By : Tractorbird Published on : 26-Feb-2026
मानसून

अल नीनो और ला नीना ऐसी प्राकृतिक समुद्री–वायुमंडलीय घटनाएँ हैं, जो प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) के सतही तापमान में बदलाव के कारण उत्पन्न होती हैं। इनका असर केवल समुद्र तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी वैश्विक मौसम प्रणाली को प्रभावित करता है। भारत का मानसून भी इन परिवर्तनों से गहराई से जुड़ा हुआ है, क्योंकि समुद्री तापमान और वायुदाब में बदलाव मानसूनी हवाओं की ताकत और दिशा तय करते हैं।

अल नीनो: कमजोर मानसून की आशंका

अल नीनो की स्थिति तब बनती है जब दक्षिण अमेरिका के निकट प्रशांत महासागर का पानी सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है। यह अतिरिक्त गर्मी वायुमंडलीय दबाव प्रणाली को असंतुलित कर देती है। परिणामस्वरूप, भारत की ओर आने वाली मानसूनी हवाएँ कमजोर पड़ सकती हैं।

ऐसे वर्षों में मानसून के आगमन में देरी, सामान्य से कम वर्षा और कई क्षेत्रों में सूखे जैसी परिस्थितियाँ देखने को मिलती हैं। वर्षा-आधारित खेती पर निर्भर किसानों को सबसे अधिक नुकसान होता है। जलाशयों में पानी की कमी, फसल बुवाई में देरी और उत्पादन घटने जैसी समस्याएँ सामने आती हैं।

ला नीना: मजबूत और अधिक वर्षा वाला मानसून

ला नीना, अल नीनो का उलटा चरण है। इसमें प्रशांत महासागर का तापमान सामान्य से अधिक ठंडा हो जाता है। यह स्थिति भारतीय मानसून को ऊर्जा प्रदान करती है और वर्षा को बढ़ावा देती है।

ला नीना के वर्षों में अक्सर सामान्य से अधिक बारिश दर्ज की जाती है। इससे जल स्रोत भरते हैं और खरीफ फसलों को पर्याप्त पानी मिलता है। हालांकि, अत्यधिक वर्षा के कारण बाढ़, जलभराव और फसल क्षति का खतरा भी बढ़ जाता है। इसलिए ला नीना का प्रभाव लाभकारी होने के साथ-साथ जोखिमपूर्ण भी हो सकता है।

जलवायु परिवर्तन और बदलता मानसून

ग्लोबल वार्मिंग (Global warming) के कारण पृथ्वी का औसत तापमान लगातार बढ़ रहा है। इस तापमान वृद्धि ने मानसून के पारंपरिक स्वरूप को प्रभावित किया है। अब वर्षा का पैटर्न पहले की तुलना में अधिक अनियमित और चरम होता जा रहा है।

कम समय में तीव्र वर्षा

गर्म वातावरण अधिक नमी को संचित कर सकता है। जब यह नमी अचानक वर्षा के रूप में गिरती है, तो कुछ ही घंटों में भारी बारिश हो जाती है। इसके कारण शहरी क्षेत्रों में जलभराव और ग्रामीण इलाकों में अचानक बाढ़ की घटनाएँ बढ़ रही हैं।

लंबे सूखे अंतराल

पहले मानसून के दौरान हल्की से मध्यम वर्षा कई दिनों तक लगातार होती थी। अब बारिश के बीच लंबे सूखे दौर देखने को मिलते हैं। इससे मिट्टी की नमी कम हो जाती है और फसलों की वृद्धि प्रभावित होती है। किसानों को अतिरिक्त सिंचाई करनी पड़ती है, जिससे लागत बढ़ जाती है।

आगमन और वापसी में अनिश्चितता

मानसून के आने और लौटने का समय अब पहले जैसा स्थिर नहीं रहा। कभी देर से आगमन तो कभी समय से पहले वापसी—ये बदलाव कृषि चक्र को प्रभावित करते हैं। बुवाई और कटाई के समय में गड़बड़ी से पैदावार और गुणवत्ता दोनों प्रभावित होती हैं।

हिंद महासागर में तापमान परिवर्तन क्या संकेत देता है?

मानसून की गति इस बात पर निर्भर करती है कि भूमि समुद्र से अधिक गर्म हो। लेकिन हाल के वर्षों में हिंद महासागर (Indian Ocean) भी तेजी से गर्म हो रहा है। जब समुद्र और जमीन के तापमान का अंतर कम हो जाता है, तो मानसूनी हवाओं की ताकत कमजोर पड़ सकती है, जिससे वर्षा का वितरण असंतुलित हो जाता है।

अल नीनो और ला नीना जैसे प्राकृतिक चक्र तथा जलवायु परिवर्तन—दोनों ही भारत के मानसून को प्रभावित कर रहे हैं। एक ओर अल नीनो वर्षा घटाकर सूखे की स्थिति पैदा कर सकता है, तो दूसरी ओर ला नीना अत्यधिक वर्षा का कारण बन सकता है। साथ ही, बढ़ते वैश्विक तापमान ने वर्षा को अधिक अनिश्चित और तीव्र बना दिया है।

भविष्य में इन चुनौतियों से निपटने के लिए जल-संरक्षण, बेहतर मौसम पूर्वानुमान, और जलवायु-अनुकूल कृषि पद्धतियों को अपनाना अत्यंत आवश्यक होगा, ताकि किसान और देश की अर्थव्यवस्था दोनों सुरक्षित रह सकें।

Tractorbird प्लैटफॉर्म आपको खेती-बाड़ी से जुड़ी सभी ताज़ा जानकारियां उपलब्ध कराता रहता है। इसके माध्यम से ट्रैक्टरों के नए मॉडल, उनकी विशेषताएँ और खेतों में उनके उपयोग से संबंधित अपडेट नियमित रूप से साझा किए जाते हैं। साथ ही स्वराजमहिंद्रान्यू हॉलैंडवीएसटी और कुबोटा जैसी प्रमुख कंपनियों के ट्रैक्टरों की पूरी जानकारी भी यहां प्राप्त होती है।

Join TractorBird Whatsapp Group

Categories

Similar Posts