छत्तीसगढ़ में धान की कटाई के बाद खेतों को खाली छोड़ने के बजाय रबी सीजन में उनका उपयोग करने पर जोर दिया जा रहा है। इसी उद्देश्य से रायपुर स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के राष्ट्रीय जैविक स्ट्रेस प्रबंधन संस्थान में किसानों के लिए जागरूकता और बीज वितरण कार्यक्रम आयोजित किया गया। ‘खेत बचाओ अभियान–रबी 2026’ के तहत हुए इस आयोजन में किसानों को धान के बाद सरसों की खेती अपनाने के फायदे, फसल अवशेषों के उचित प्रबंधन और वैज्ञानिक कृषि तकनीकों की जानकारी दी गई।
कार्यक्रम के दौरान किसानों को सरसों की उन्नत किस्म DRMR 150-35 के प्रमाणित बीज उपलब्ध कराए गए। संस्थान के मुताबिक, अनुसूचित जाति उपयोजना और जनजातीय उपयोजना के अंतर्गत लाभ पाने वाले किसानों के बीच वितरित बीजों से करीब 270 एकड़ क्षेत्र में सरसों की खेती को प्रोत्साहन मिलने की उम्मीद है।
वैज्ञानिकों ने किसानों को बताया कि धान की कटाई के बाद खेत में मौजूद नमी और उपलब्ध समय का सही इस्तेमाल किया जाए तो उसी कृषि वर्ष में दूसरी फसल लेकर अतिरिक्त आमदनी हासिल की जा सकती है। सरसों कम अवधि में तैयार होने वाली प्रमुख तिलहनी फसल है और सीमित पानी वाले क्षेत्रों में भी इसकी खेती संभव है। इस वजह से धान-सरसों फसल प्रणाली किसानों के लिए उपयोगी विकल्प बन सकती है।
भारतीय रेपसीड-सरसों अनुसंधान संस्थान, भरतपुर के तकनीकी विवरण के अनुसार DRMR 150-35 को जोन-V के लिए अनुशंसित किया गया है। इस क्षेत्र में छत्तीसगढ़ के साथ ओडिशा, पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड और असम शामिल हैं। खास बात यह है कि इस किस्म को वर्षा आधारित परिस्थितियों के लिए भी उपयुक्त माना गया है।
तकनीकी आंकड़ों के अनुसार इसकी परिपक्वता अवधि करीब 114 दिन है और इसमें तेल की मात्रा लगभग 36.7 से 42.8 प्रतिशत तक पाई गई है। इसकी औसत उपज क्षमता 12 से 18 क्विंटल प्रति हेक्टेयर बताई गई है। हालांकि वास्तविक उत्पादन खेत की मिट्टी, मौसम, बुवाई की तारीख, सिंचाई और फसल प्रबंधन जैसे कारकों पर निर्भर करेगा।
कार्यक्रम में संस्थान के संयुक्त निदेशक डॉ. पंकज शर्मा ने किसानों को सरसों की वैज्ञानिक खेती के बारे में जानकारी दी। उन्होंने कहा कि अनुकूल परिस्थितियों में DRMR 150-35 की फसल लगभग 95 से 110 दिनों में तैयार हो सकती है। उपलब्ध तकनीकी विवरण में इसकी परिपक्वता अवधि 114 दिन दर्ज है।
किसानों को सलाह दी गई कि सरसों की बुवाई में अनावश्यक देरी न करें और 30 नवंबर तक बुवाई पूरी कर लें। सही समय पर बुवाई होने से फसल को शुरुआती विकास के लिए अनुकूल मौसम मिल सकता है। इसके साथ बीज की उचित मात्रा, कतारों की दूरी, संतुलित पोषण और आवश्यकता के अनुसार सिंचाई का ध्यान रखना भी जरूरी बताया गया।
वैज्ञानिकों के अनुसार बेहतर प्रबंधन की स्थिति में करीब 10 से 12 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उत्पादन हासिल किया जा सकता है। हालांकि उपज का अंतिम स्तर स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर रहेगा।
कार्यक्रम में किसानों को पराली और धान के अन्य अवशेषों को जलाने से रोकने पर विशेष जोर दिया गया। विशेषज्ञों ने बताया कि फसल अवशेषों को आग लगाने के बजाय कृषि यंत्रों की सहायता से खेत में ही प्रबंधित किया जा सकता है।
मल्चर जैसे उपकरणों से धान के अवशेषों को छोटे टुकड़ों में काटकर मिट्टी में मिलाने से जैविक पदार्थ बढ़ाने में मदद मिलती है। इससे मिट्टी की संरचना बनाए रखने और पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण में भी सहायता मिल सकती है। इसलिए किसानों को सलाह दी गई कि धान की कटाई के बाद अवशेषों का वैज्ञानिक तरीके से निपटारा करें और इसके बाद रबी फसल की तैयारी शुरू करें।
वैज्ञानिकों ने किसानों को धान के साथ दलहन और तिलहन फसलों को फसल चक्र में शामिल करने की सलाह दी। लगातार एक ही फसल उगाने की बजाय अलग-अलग फसलों को अपनाने से खेत के उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग किया जा सकता है। सरसों जैसी तिलहनी फसल किसान को धान के बाद अतिरिक्त उत्पादन के साथ आय का दूसरा अवसर भी देती है।
संस्थान के निदेशक डॉ. पी.के. राय ने कहा कि ‘खेत बचाओ अभियान’ का व्यापक उद्देश्य मिट्टी की उर्वरता बनाए रखना, प्राकृतिक संसाधनों का संतुलित उपयोग करना और किसानों को टिकाऊ कृषि पद्धतियों से जोड़ना है। उन्होंने फसल अवशेष प्रबंधन, संतुलित खाद-उर्वरक उपयोग और वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाने की अपील की। कार्यक्रम में महिला और पुरुष किसानों के साथ जनप्रतिनिधियों ने भी हिस्सा लिया।
डॉ. के.सी. शर्मा और डॉ. प्रियंका मीना ने कार्यक्रम का संचालन किया। विशेषज्ञों का मानना है कि धान की कटाई के बाद खेत की नमी और समय का सही उपयोग कर सरसों की खेती को बढ़ावा दिया जाए तो किसानों की आय में अतिरिक्त योगदान हो सकता है। साथ ही, इससे फसल विविधीकरण, मिट्टी के स्वास्थ्य और टिकाऊ खेती को भी मजबूती मिलेगी।
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