मानसून का मौसम कृषि के लिए जितना लाभदायक माना जाता है, पशुपालन के लिहाज से उतना ही चुनौतीपूर्ण भी होता है। जुलाई से सितंबर के बीच वातावरण में नमी बढ़ जाती है, तापमान में लगातार उतार-चढ़ाव होता है और उमस के कारण पशुओं का शरीर अतिरिक्त तनाव महसूस करता है।
इस मौसम का सीधा असर गाय, भैंस और अन्य दुधारू पशुओं की रोग प्रतिरोधक क्षमता पर पड़ता है। पाचन तंत्र कमजोर होने से पशु पर्याप्त पोषण नहीं ले पाते, जिससे उनका स्वास्थ्य प्रभावित होता है। यदि समय रहते उचित देखभाल नहीं की जाए तो संक्रामक रोग तेजी से फैल सकते हैं। इससे दूध उत्पादन घटता है, पशु कमजोर हो जाते हैं और पशुपालकों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। विशेषज्ञों का मानना है कि थोड़ी सावधानी और नियमित देखभाल से अधिकांश बीमारियों से बचाव संभव है।
बरसात के मौसम में गलघोंटू बीमारी का खतरा सबसे अधिक रहता है। यह एक गंभीर जीवाणुजनित संक्रामक रोग है, जो बहुत तेजी से फैलता है और समय पर उपचार न मिलने पर पशु की मृत्यु भी हो सकती है। इस बीमारी की शुरुआत तेज बुखार, शरीर में कंपन, भूख कम लगना और अत्यधिक कमजोरी से होती है।
इसके बाद पशु के गले में सूजन आ जाती है, जिससे उसे सांस लेने में कठिनाई होती है और मुंह तथा नाक से तरल पदार्थ निकलने लगता है। पशु चिकित्सकों की सलाह है कि मानसून शुरू होने से पहले या शुरुआती दिनों में ही सरकारी पशु चिकित्सालय में उपलब्ध निःशुल्क टीका अवश्य लगवाना चाहिए। यदि किसी पशु का टीकाकरण छूट गया हो तो बिना देरी किए नजदीकी पशु चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए।
मानसून में खुरपका-मुंहपका (एफएमडी) और सर्रा रोग जैसी बीमारियां भी तेजी से फैलने लगती हैं। खुरपका-मुंहपका बीमारी में पशु के मुंह में छाले पड़ जाते हैं, खुरों में घाव बन जाते हैं और वह चारा खाना बंद कर देता है। हालांकि इस बीमारी से मृत्यु की संभावना कम होती है, लेकिन पशु लंबे समय तक कमजोर रहता है और दूध उत्पादन में भारी गिरावट आ जाती है।
दूसरी ओर सर्रा रोग मक्खियों के माध्यम से फैलता है, इसलिए बरसात में इसकी आशंका अधिक रहती है। इन दोनों बीमारियों से बचाव के लिए समय पर टीकाकरण, पशुशाला की नियमित सफाई और कीटनाशकों का छिड़काव करना आवश्यक है। साथ ही खुरों की समय-समय पर सफाई करने से संक्रमण का खतरा काफी कम हो जाता है।
बरसात के मौसम में किलनी, चिचड़े और जूं जैसे बाहरी परजीवी तेजी से बढ़ते हैं। ये परजीवी पशुओं का खून चूसकर उन्हें कमजोर बना देते हैं और कई अन्य संक्रमणों को भी जन्म देते हैं। यदि समय रहते इनका नियंत्रण नहीं किया जाए तो पशुओं का वजन कम होने लगता है और दूध उत्पादन पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
पशुपालकों को चाहिए कि वे नियमित रूप से पशुओं के शरीर की जांच करें और किसी भी प्रकार के परजीवी दिखाई देने पर पशु चिकित्सक की सलाह से दवा का उपयोग करें। दवा लगाने के बाद कम से कम 24 घंटे तक पशु को नहीं नहलाना चाहिए, ताकि दवा अपना पूरा असर दिखा सके। साथ ही पशुशाला की सफाई और कीट नियंत्रण पर भी बराबर ध्यान देना चाहिए।
मानसून के दौरान पेट में कीड़ों की समस्या भी आम हो जाती है। यह समस्या छोटे बछड़ों और बड़े पशुओं दोनों के लिए नुकसानदायक होती है। बछड़ों में कृमि संक्रमण के कारण विकास रुक सकता है, जबकि बड़े पशुओं में दूध उत्पादन घट जाता है और शरीर कमजोर होने लगता है। इसलिए समय-समय पर कृमिनाशक दवा देना बेहद आवश्यक है।
विशेषज्ञों के अनुसार नवजात बछड़ों को जन्म के लगभग 15 दिन बाद पहली बार कृमिनाशक दवा दी जानी चाहिए। वहीं बड़े पशुओं को हर चार महीने के अंतराल पर डॉक्टर की सलाह के अनुसार दवा देना लाभदायक रहता है। बिना चिकित्सकीय सलाह के किसी भी दवा का उपयोग नहीं करना चाहिए, क्योंकि गलत दवा पशु के स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा सकती है।
बरसात के मौसम में पशुशाला की स्वच्छता बनाए रखना सबसे महत्वपूर्ण कार्यों में शामिल है। गीला फर्श, जमा हुआ पानी और गंदगी बैक्टीरिया, वायरस तथा परजीवियों के पनपने के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करते हैं। इसलिए पशुशाला में पानी का उचित निकास होना चाहिए ताकि फर्श सूखा रहे।
गोबर और अन्य अपशिष्ट पदार्थों को प्रतिदिन हटाना चाहिए तथा समय-समय पर कीटाणुनाशक दवाओं का छिड़काव करना चाहिए। यदि कोई पशु बीमार हो जाए तो उसे तुरंत स्वस्थ पशुओं से अलग रखना चाहिए, ताकि संक्रमण अन्य पशुओं तक न फैले। स्वच्छ वातावरण पशुओं की रोग प्रतिरोधक क्षमता बनाए रखने में भी मदद करता है।
मानसून में पशुओं को दिया जाने वाला चारा पूरी तरह साफ और सूखा होना चाहिए। गीला, सड़ा या फफूंद लगा चारा पशुओं के पाचन तंत्र को नुकसान पहुंचा सकता है और कई बीमारियों का कारण बन सकता है। पशुओं को पर्याप्त मात्रा में हरा चारा, सूखा चारा, खनिज मिश्रण और संतुलित आहार उपलब्ध कराना जरूरी है।
इसके साथ ही उन्हें हर समय स्वच्छ और ताजा पानी मिलना चाहिए। यदि पशु का भोजन संतुलित होगा तो उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत बनी रहेगी और दूध उत्पादन भी प्रभावित नहीं होगा। उचित पोषण से पशु मौसम के बदलाव का सामना बेहतर तरीके से कर पाते हैं।
पशुपालन में सफलता केवल अच्छे नस्ल के पशु रखने से नहीं मिलती, बल्कि उनकी नियमित देखभाल भी उतनी ही आवश्यक होती है। मानसून के दौरान यदि किसी पशु में बुखार, सुस्ती, भूख कम लगना, सांस लेने में परेशानी, दूध उत्पादन में कमी या कोई अन्य असामान्य लक्षण दिखाई दें तो तुरंत पशु चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए।
समय पर उपचार से बीमारी गंभीर होने से पहले ही नियंत्रित की जा सकती है। इसके अलावा नियमित टीकाकरण, कृमिनाशन, परजीवी नियंत्रण, साफ-सफाई और संतुलित पोषण जैसी आदतें अपनाकर पशुपालक अपने पशुओं को पूरे मानसून में स्वस्थ रख सकते हैं। इससे न केवल पशुओं की उत्पादकता बनी रहती है, बल्कि डेयरी व्यवसाय में होने वाले आर्थिक नुकसान को भी काफी हद तक कम किया जा सकता है।
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