रबी मौसम में गेहूँ भारत की सबसे प्रमुख और व्यापक रूप से उगाई जाने वाली फसलों में से एक है। यह फसल ठंडे मौसम में अच्छी तरह विकसित होती है और हल्के पाले को भी कुछ हद तक सहन करने की क्षमता रखती है।
हालांकि, अनुकूल जलवायु के साथ-साथ गेहूँ की फसल पर कई प्रकार के घातक रोगों का खतरा भी बना रहता है। यदि इन रोगों की समय रहते पहचान और उचित रोकथाम न की जाए, तो फसल की उपज और गुणवत्ता दोनों पर गंभीर प्रभाव पड़ता है, जिससे किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।
इसलिए यह बेहद जरूरी है कि किसान भाई गेहूँ में लगने वाले प्रमुख रोगों के लक्षण, कारण और उनके नियंत्रण के उपायों की सही जानकारी रखें, ताकि रोग का प्रकोप बढ़ने से पहले ही उसका उपचार किया जा सके।
गेहूँ में लगने वाला भूरा रतुआ रोग एक अत्यंत सामान्य लेकिन नुकसानदायक रोग है, जो Puccinia recondita tritici नामक कवक के कारण होता है। यह रोग भारत के लगभग सभी गेहूँ उत्पादक क्षेत्रों में पाया जाता है।
इस रोग की शुरुआत मुख्य रूप से उत्तर भारत की हिमालयी पहाड़ियों और दक्षिण भारत की नीलगिरी पहाड़ियों से होती है, जहाँ यह कवक जीवित रहता है। वहां से यह हवा के माध्यम से मैदानी इलाकों तक फैलकर गेहूँ की फसल को संक्रमित करता है।
इस रोग के शुरुआती लक्षण पत्तियों पर दिखाई देते हैं। प्रारंभ में पत्तियों पर नारंगी रंग के सुई की नोक जैसे छोटे-छोटे धब्बे बनते हैं, जो धीरे-धीरे संख्या में बढ़कर पूरी पत्ती पर फैल जाते हैं।
जैसे-जैसे फसल परिपक्व होती है, ये धब्बे गहरे रंग के होकर काले दिखाई देने लगते हैं। यदि समय पर नियंत्रण न किया जाए, तो यह रोग प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया को प्रभावित करता है और उपज में भारी गिरावट का कारण बनता है।
पीला रतुआ रोग, जिसे येलो रस्ट भी कहा जाता है, Puccinia striiformis नामक कवक से होता है। यह रोग मुख्य रूप से ठंडे और नम मौसम में तेजी से फैलता है।
इसके लक्षण गेहूँ की पत्तियों की ऊपरी सतह पर पीली रंग की धारियों के रूप में दिखाई देते हैं, जो पत्ती की नसों के समानांतर होती हैं। धीरे-धीरे ये धारियां पूरी पत्ती को पीला कर देती हैं और खेत में पीले रंग का चूर्ण जमीन पर गिरने लगता है।
यदि यह रोग कल्ले निकलने की अवस्था या उससे पहले आ जाए, तो फसल में बालियां नहीं बनतीं, जिससे उपज लगभग समाप्त हो सकती है। यह रोग उत्तरी हिमालय की पहाड़ियों से शुरू होकर उत्तरी मैदानी क्षेत्रों तक फैलता है।
जैसे-जैसे तापमान बढ़ता है, इस रोग का प्रभाव कम होने लगता है और पत्तियों पर मौजूद पीली धारियां काले रंग में बदल जाती हैं।
गेहूँ का तना रतुआ रोग, जिसे काला रतुआ भी कहा जाता है, Puccinia graminis tritici नामक कवक के कारण होता है। यह रोग मुख्य रूप से नीलगिरी और पलनी पहाड़ियों से फैलता है और दक्षिण तथा मध्य भारत के क्षेत्रों में अधिक देखने को मिलता है।
उत्तर भारत में यह रोग आमतौर पर फसल पकने की अवस्था में आता है, इसलिए वहां इसका प्रभाव अपेक्षाकृत कम होता है।
यह बीमारी सामान्यतः 20 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान में तेजी से फैलती है। इसके लक्षण पत्तियों और तनों पर चॉकलेट या काले रंग के धब्बों के रूप में दिखाई देते हैं। यह रोग पौधे की मजबूती को कमजोर कर देता है, जिससे फसल गिरने लगती है।
नवीनतम दक्षिणी और मध्य भारत की कई किस्में इस रोग के प्रति सहनशील हैं, लेकिन लोक-1 जैसी पुरानी किस्मों में यह रोग आज भी बहुत आम है।
तीनों रतुआ रोगों से बचाव के लिए सबसे पहले रोकथाम पर ध्यान देना अत्यंत आवश्यक है। किसानों को बुवाई के समय ही इन रोगों के प्रति प्रतिरोधी एवं उन्नत किस्मों का चयन करना चाहिए।
इसके अलावा, बुवाई से पहले बीज को थाइरम 2.5 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करना चाहिए, जिससे प्रारंभिक अवस्था में रोग का खतरा कम हो जाता है।
यदि खड़ी फसल में रतुआ रोग का प्रकोप दिखाई दे, तो नियंत्रण के लिए प्रोपिकोनाजोल 25 ई.सी. का 0.1 प्रतिशत घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए। यह फफूंदनाशी दवा रोग के फैलाव को रोकने में काफी प्रभावी होती है।
करनाल बंट रोग गेहूँ का एक गंभीर रोग है, जिसकी पहली बार पहचान वर्ष 1931 में हरियाणा के करनाल जिले में हुई थी। आज यह रोग कई अन्य देशों में भी पाया जाता है।
भारत में यह रोग अधिकतर ठंडे और नम जलवायु वाले क्षेत्रों में देखने को मिलता है। यह बीमारी जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड के मैदानी क्षेत्र, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और उत्तरी राजस्थान में अधिक पाई जाती है।
इसके विपरीत, कर्नाटक, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, गुजरात और मध्यप्रदेश जैसे अधिक तापमान वाले राज्यों में यह रोग बहुत कम होता है।
इस बीमारी का कारण Tilletia indica नामक कवक है, जो मृदा में लंबे समय तक जीवित रह सकता है। संक्रमित बीजों के माध्यम से यह रोग नए क्षेत्रों में फैलता है।
इस रोग में गेहूँ के दानों के अंदर काला चूर्ण भर जाता है, जिससे दानों की गुणवत्ता और अंकुरण क्षमता दोनों प्रभावित होती हैं।
इसके अलावा, जिन देशों में यह रोग नहीं पाया जाता, वे गेहूँ के आयात पर सख्त नियम लागू करते हैं, जिससे अंतरराष्ट्रीय गेहूँ निर्यात पर भी नकारात्मक असर पड़ता है।
करनाल बंट रोग की रोकथाम के लिए बुवाई से पहले बीज को थाइरम 2.5 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करना चाहिए। साथ ही, रोग-प्रतिरोधी एवं उन्नत किस्मों का उपयोग करना अत्यंत आवश्यक है।
यदि खड़ी फसल में रोग की आशंका हो, तो दाना बनने की अवस्था में प्रोपिकोनाजोल 25 ई.सी. का 0.1 प्रतिशत घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए, जिससे रोग के प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
गेहूँ की फसल में लगने वाले ये रोग यदि समय रहते नियंत्रित न किए जाएं, तो उपज और गुणवत्ता दोनों को भारी नुकसान पहुंचा सकते हैं।
इसलिए किसानों को नियमित रूप से अपनी फसल का निरीक्षण करना चाहिए और रोग के शुरुआती लक्षण दिखाई देते ही उचित कृषि वैज्ञानिक सलाह और दवाओं का उपयोग करना चाहिए। सही जानकारी, समय पर उपचार और उन्नत किस्मों के उपयोग से गेहूँ की फसल को इन घातक रोगों से सुरक्षित रखा जा सकता है।
Tractorbird प्लैटफॉर्म आपको खेती-बाड़ी से जुड़ी सभी ताज़ा जानकारियां उपलब्ध कराता रहता है। इसके माध्यम से ट्रैक्टरों के नए मॉडल, उनकी विशेषताएँ और खेतों में उनके उपयोग से संबंधित अपडेट नियमित रूप से साझा किए जाते हैं। साथ ही स्वराज, महिंद्रा, न्यू हॉलैंड, वीएसटी और कुबोटा जैसी प्रमुख कंपनियों के ट्रैक्टरों की पूरी जानकारी भी यहां प्राप्त होती है।