तोरई की खेती के बेहतरीन तरीके – जानें पूरी जानकारी!

By : Tractorbird News Published on : 02-Apr-2025
तोरई

भारत में तोरई की खेती कई स्थानों पर की जाती है इसका उपयोग हरी सब्जी के रूप में किया जाता है। भारत में इसकी दो प्रजातियाँ पाई जाती है। 

दोनों तोरई प्रजातियाँ – चिकनी या स्पंज तुरई और धारदार या तोरई – लूफा (Luffa) वंश से संबंधित हैं। इस वंश का नाम "लूफा" उत्पाद से लिया गया है, जिसका उपयोग स्नान स्पंज, स्क्रबर पैड, दरवाजे की चटाई, तकिए, गद्दे, बर्तन साफ करने आदि के लिए किया जाता है। इन दोनों प्रजातियों में एक जिलेटिनस यौगिक पाया जाता है, जिसे "लूफेन" कहा जाता है।

दोनों फसलें व्यावसायिक स्तर पर उगाई जाती हैं और घरेलू उद्यानों में भी इनकी खेती की जाती है। इसके कच्चे फलों का उपयोग सब्जी के रूप में किया जाता है। 

इसके सूखे और परिपक्व फलों के रेशों का उपयोग स्नान स्पंज के रूप में किया जाता है। 

चूंकि इसके कोमल फल आसानी से पचने योग्य और भूख बढ़ाने वाले होते हैं, इसलिए इन्हें मलेरिया और अन्य मौसमी बुखार से पीड़ित लोगों के लिए सेवन करने की सलाह दी जाती है।

तोरई की खेती के लिए जलवायु और मिट्टी

करेले की तरह, तोरई (धारदार तुरई) और स्पंज तुरई गर्म जलवायु वाली फसलें हैं और गर्मी तथा वर्षा ऋतु में अच्छी तरह विकसित होती है। इन फसलों के लिए आदर्श तापमान 25-27°C होता है।

उपयुक्त मिट्टी उपजाऊ, अच्छी जल निकासी वाली दोमट मिट्टी होती है, जो ह्यूमस से भरपूर हो।

खेती की विधियाँ

तोरई और स्पंज तुरई को गर्मी और वर्षा ऋतु में उगाया जाता है। बीज बोने का समय जनवरी-फरवरी (गर्मी) और जून-जुलाई (वर्षा ऋतु) होता है। बीजों को उठी हुई क्यारियों, नालियों या गड्ढों में बोया जाता है।

- तोरई के लिए बीज की मात्रा **3.5-5.0 किग्रा/हेक्टेयर** होती है।

- स्पंज तुरई के लिए बीज की मात्रा **2.5-5.0 किग्रा/हेक्टेयर** होती है।

चूंकि बीजों का बाहरी छिलका कठोर होता है, इसलिए इन्हें पानी में रातभर भिगोना फायदेमंद होता है।

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रोपण दूरी

  • बावर (मचान) या ट्रेलिस प्रणाली:

इस प्रणाली में पंक्ति से पंक्ति की दूरी 1.5-2.5 मीटर और पौधे से पौधे की दूरी 60-120 सेमी तक होती है।

  • गड्ढा पद्धति (भूमि पर फैलने की विधि): 

बुवाई की इस विधि में पंक्ति से पंक्ति की दूरी 1.5-2.0 मीटर और गड्ढे से गड्ढे की दूरी 1.0-1.5 मीटर तक होती हैं।

फसल की कटाई

- फसल बुवाई के 60 दिनों बाद कटाई के लिए तैयार हो जाती है।

- फलों को अपरिपक्व, कोमल अवस्था में तोड़ा जाता है।

- पुष्पन (एन्थेसिस) के 5-7 दिनों बाद फल बाजार में बिक्री के लिए उपयुक्त होते हैं।

- अत्यधिक पके फल रेशेदार हो जाते हैं और खाने योग्य नहीं रहते।

- हर 3-4 दिन में तुड़ाई करने से फलों की अधिक परिपक्वता को रोका जा सकता है।

- कटे हुए फलों को चोट लगने से बचाने के लिए टोकरी में पैक किया जाता है और ठंडी जगह में 3-4 दिनों तक भंडारण किया जा सकता है।

-फसल की उपज 7.5 – 15.0 टन/हेक्टेयर तक होती है।

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