सनई की खेती के बारे में सम्पूर्ण जानकारी
By : Tractorbird News Published on : 26-Mar-2025
सनई एक महत्वपूर्ण बहुउद्देश्यीय फलीदार फसल है, जो पूरे भारत में रेशा, हरी खाद और चारे के लिए उगाई जाती है।
साठ के दशक तक यह भारत में एक प्रमुख फसल थी, लेकिन हरित क्रांति और सस्ते सिंथेटिक रेशों के आगमन के कारण इसका खेती क्षेत्र धीरे-धीरे घटता गया।
वर्तमान में इसे पारंपरिक और सीमांत किसान उगाते हैं। इसको सनहेम्प (Crotalaria juncea) के नाम से भी जाना जाता हैं। इस लेख में हम आपको सनई की खेती से जुडी सम्पूर्ण जानकरी देंगे।
सनई की खेती के लिए जलवायु:
- सनई 24° उत्तरी अक्षांश से नीचे अच्छी तरह विकसित होती है और हल्की सर्दी को सहन कर सकती है, बशर्ते न्यूनतम तापमान 10°C से नीचे न जाए।
- बीज बनने की अवस्था के दौरान अच्छे धूप वाले घंटे आवश्यक होते हैं और बारिश नहीं होनी चाहिए।
सनई की खेती में भूमि की आवश्यकताएँ:
- बीज उत्पादन के लिए उपयोग की जाने वाली भूमि में अन्य फसल के पौधे नहीं होने चाहिए।
- इसकी खेती लिए दोमट मिट्टी अच्छी मानी जाती हैं। अंतिम जुताई के समय खेत में गोबर की खाद (FYM) मिलानी चाहिए।
- भूमि को 2 से 3 बार हल चलाकर और पाटा लगाकर अच्छी तरह भुरभुरी बनाना चाहिए। बीज के उचित अंकुरण के लिए मिट्टी में 25 से 30% नमी होनी चाहिए।
- उर्वरकों का प्रयोग N:P:K @ 20:40:40 किग्रा/हेक्टेयर आवश्यक है।
सनई की किस्में:
मुख्य किस्मों में ‘K 12 यलो’, ‘K 12 ब्लैक’, ‘SH 4’ (शैलेश), ‘SUN 053’ (स्वस्तिका), ‘SUIN 037’ (अंकुर) और ‘JRJ 610’ (प्रणकुर) शामिल हैं। इन किस्मों के बीज CRIJAF, बैरकपुर में उपलब्ध हैं।
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सनई की बुवाई का समय:
- सनई के बीज उत्पादन के लिए बुवाई का समय सबसे महत्वपूर्ण कारक है। उत्तर और उत्तर-पश्चिमी भारत में इसे अप्रैल से अगस्त तक उगाया जाता है।
- यह एक अल्प-दिवसीय फसल है, इसलिए फूल आना सितंबर के मध्य से नवंबर तक चलता है।
- उत्तर भारत में सबसे अच्छा बुवाई समय जुलाई के अंत से अगस्त के पहले पखवाड़े तक है।
- अगस्त के बाद बुवाई से कमजोर वृद्धि होती है और परागणकर्ताओं (Xylocopa latipes, X. fenistroides और Megachile lanata) की सक्रियता पर ठंड का प्रभाव पड़ता है, जिससे बीज उत्पादन कम हो जाता है।
- हल्की सर्दी वाले क्षेत्रों में बीज उत्पादन रबी (सितंबर-मार्च) में संभव है। ऐसे क्षेत्रों में सर्वोत्तम बुवाई समय सितंबर-अक्टूबर है।
- यदि फसल जल्दी बोई गई हो, तो 50 दिन बाद शीर्ष छंटाई (टॉपिंग) करने से अच्छी बीज पैदावार मिलती है। अक्टूबर या इसके बाद बोई गई फसल में टॉपिंग की आवश्यकता नहीं होती ।
सनई की बीज दर:
- बीज फसल के लिए 20-25 किग्रा/हेक्टेयर बीज पर्याप्त है। बेहतर अंकुरण और पौधों की मजबूती के लिए बीजों का कार्बेन्डाजिम 50 WP @ 0.1% से उपचार करना चाहिए।
- सनहेम्प में फूल केवल अंतिम शाखाओं पर आते हैं। देर से बोई गई फसल में शाखाओं की अधिक संख्या होती है। बीज उत्पादन के लिए 40 सेमी × 20 सेमी की दूरी उपयुक्त होती है।
सिंचाई प्रबंधन:
- यह फसल आमतौर पर वर्षा आधारित होती है। बुवाई के समय मिट्टी में पर्याप्त नमी होनी चाहिए, जिससे शुरुआती अवस्था में सिंचाई की आवश्यकता न हो।
- बीज बनने और फली पकने के समय 2-3 हल्की सिंचाई से उपज बढ़ती है। यदि केवल एक सिंचाई संभव हो, तो इसे फली बनने या पकने की अवस्था में देना चाहिए।
उर्वरक प्रबंधन:
यह एक दलहनी फसल है, इसलिए किसान प्रायः उर्वरक नहीं डालते। लेकिन 20 किग्रा नाइट्रोजन (N), 40 किग्रा फॉस्फोरस (P), और 40 किग्रा पोटाश (K) प्रति हेक्टेयर देने से उपज में वृद्धि होती है।
- नाइट्रोजन की आधी मात्रा और फॉस्फोरस तथा पोटाश की पूरी मात्रा अंतिम जुताई के समय डालें।
- शेष नाइट्रोजन 25-30 दिन बाद दें।
सनई की कटाई:
- फसल की कटाई 120-140 दिन बाद करनी चाहिए, जब फली में बीज खड़कने लगे, कटाई दराती से की जाती हैं। थ्रेशिंग ट्रैक्टर या हाथ से फली को कठोर सतह पर पीटकर करें।
- बीजों को तब तक धूप में सुखाएं जब तक कि उनकी नमी 10% न हो जाए, जिससे भंडारण के लिए उपयुक्त रहें।
- बीज उत्पादन जलवायु और प्रबंधन पर निर्भर करता है। बीज उत्पादन 10-16 क्विंटल/हेक्टेयर तक होता है।