तिल की खेती में लगने वाले रोग और उनका नियंत्रण

By : Tractorbird News Published on : 17-May-2024
तिल

तिल की खेती एक तिलहनी फसल के रूप में की जाती है। तिल की खेती भारत में एक महत्वपूर्ण और लाभकारी खेती है। तिल का तेल खाद्य, औषधीय और औद्योगिक उपयोग के लिए महत्वपूर्ण है। 

तिल की खेती में किसानों को कई रोगों का सामना करना पड़ता है जो की फसल को बहुत नुकसान पहुंचाते है। 

इस लेख में हम आपको तिल की फसल में लगने वाले प्रमुख रोगों और उनके रोकथाम के बारे में सम्पूर्ण जानकारी देंगे।

तिल की फसल में लगने वाले प्रमुख रोग 

1. फाईटोपथोरा झुलसन (Phytophthora parasitica var. sesami) 

  • तिल की फसल का ये रोग खतरनाक रोग होता है। फसल में ये रोग फाईटोपथोरा पेरासिटीका नामक जीवाणु से होता है। 
  • इस रोग से संक्रमित पौधों की पत्तियों पर सिंघाड़े के जैसे धब्बे बनते है जो बाद में काले हो जाते है। नम वातावरण में रोग तेजी से फैलता है जिससे पौधा झुलस जाता है। 
  • मिट्टी के स्तर के पास तने पर काले रंग के घाव दिखाई देते हैं। 
  • रोग का संक्रमण अधिक होता है अथवा शाखाओं को प्रभावित करता है और तने को घेर लेता है, जिसके परिणामस्वरूप पौधे की मृत्यु हो सकती है। 
  • पत्तियों पर पानी से भीगे हुए धब्बे दीखते हैं और पत्तियाँ सूख जाती है। फूलों पर संक्रमण देखा जा सकता है। 

रोग नियंत्रण के उपाय 

  • रोग की रोकथाम के लिए प्रतिरोधक किस्मों का उपयोग करें।
  • पौधे के अवशेषों को जलाकर नष्ट करें।
  • फसल चक्र अपनाए।
  • रोग को फलने से रोकने के लिए 0.3 प्रतिशत एप्रोन 35 एस.डी. या थाईरम 0.3 प्रतिशत या ट्राईकोडर्मा हजारीएनम या टी.विरिडी. या बेसीलस सबटिलिस 0.4 प्रतिशत से बीजोपचार कर बोना चाहिए।
  • तना एवं जड़ सड़न की स्थिति में सात दिन के अंतराल से मिट्टी को रोग ग्रसित पौधों के साथ 2 या 3 बार रेडोमिल एमजेड 0.25 प्रतिशत घोल से गीला करना चाहिए।
  • रेडोमिल एमजेड 0.25 प्रतिशत या कॉपर ओक्सीक्लोराइड 0.25 प्रतिशत का 10 दिन के अंतराल से रोग के शुरू होने पर तीन बार छिड़काव करें।

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2. स्टेम एवं रूट रॉट (Rhizoctonia bataticola) 

  • रोग ग्रसित पौधे की जड़े तथा आधार पर से छिलका हटाने पर काले स्क्लेरोशियम दिखते है जिनसे जड़ का रंग कोयले के समान धूसर काला दिखता है। 
  • संक्रमित जड़ कम शक्ति लगाने पर भी कांच के समान टूट जाती है। 
  • तने के सहारे जमीन की सतह पर सफेद फंफूद दिखती है जिसमें राई के समान स्क्लेरोशिया होते है फ्यूजेरियम सेलेनाई फंफूद के संक्रमित पौधों की जड़ सिंकुड़ी सी लालिमायुक्त होती है।

रोग नियंत्रण के उपाय 

  • रोग से बचाव के लिए प्रतिरोधक किस्मों का उपयोग करें।
  • पौधे के अवशेषों को जलाकर नष्ट करें।
  • फसल चक्र अपनाए या हर दो साल में खेत बदल दे।
  • सिंचाई जरूरत पड़ने पर हर दो सप्ताह में करें।
  • रोग को नियंत्रित करने के लिए ट्राईकोडर्मा हजारीएनम या टी.विरिडी. या बेसीलस सबटिलिस 0.4 प्रतिशत या थाईरम 75 एस.डी. 0.15 प्रतिशत और बेवीस्टीन 0.05 प्रतिशत का 1:1 या थाईरम 75 एस.डी. 0.3 प्रतिशत से बीजोपचार कर बोना चाहिए।

3. टिक्का रोग (Cercospora sesami) 

  • यह रोग सबसे पहले पत्तियों पर पानी से लथपथ छोटे-छोटे घावों के रूप में दिखाई देता है, जो बाद में बड़े हो जाता है। 
  • पत्ती की दोनों सतह पर 5-15 मिमी व्यास के गोल से अनियमित धब्बे बनते हैं। 
  • धब्बे आपस में जुड़ जाते हैं और अलग-अलग आकार के अनियमित पैच बनते हैं जिससे समय से पहले पत्तियां गिर जाती हैं। 
  • तने और डंठल पर भी संक्रमण देखने को मिलता है, इन के ऊपर अलग-अलग लंबाई के धब्बे बनते हैं। 
  • फलियों पर गहरे रेखीय धब्बे भी बनते हैं जो की पौधे की शुष्कता का कारण बनता है। रोग की अधिकता में अधिकतर पत्तियां झड़ जाती है। 

रोग नियंत्रण के उपाय 

  • इस रोग को रोकने के लिए प्रतिरोधक किस्मों जैसे टी.के.जी.-21 का उपयोग करें।
  • मानसून के आने के तुरन्त बाद तिल की बुवाई करनी चाहिए। 
  • पौधे के अवशेषों को जलाकर नष्ट करें।

ये भी पढ़ें: How to take care of horticultural crops in summer?

4. पाऊडरी मिल्डयू (Oidium acanthospermi)

  • इस रोग से संक्रमित पौधों पर प्रारंभ में पत्तियों की ऊपरी सतह पर भूरे-सफ़ेद पाउडर जैसी वृद्धि दिखाई देती है। 
  • कई धब्बे आपस में मिल जाते हैं, पूरी पत्ती की सतह पाउडर जैसी कोटिंग से ढकी हो सकती है। 
  • गंभीर में मामलों में, संक्रमण फूलों और युवा कैप्सूलों पर देखा जा सकता है, जिससे समय से पहले पौधे की मृत्यु हो सकती है। 
  • गंभीर रूप से प्रभावित पत्तियां मुड़ी हुई और विकृत हो सकती हैं। ज्यादा संक्रमण होने पर पत्तियां झड़ जाती है।

रोग नियंत्रण के उपाय 

  • मानसून के आने के तुरन्त बाद फसल की बुवाई करें।
  • स्वच्छ खेती करें। 
  • पौधे के अवशेषों को जलाकर नष्ट करें।
  • वेटेबल सल्फर 2.5 किग्रा/हेक्टेयर या कैराथेन 1 लीटर/हेक्टेयर का छिड़काव 15 दिनों के बाद दोहराएँ। इसके आलावा 0.2 प्रतिशत गीला सल्फर का 10 दिन के अंतराल से रोग के शुरू होने से पत्तियों पर छिड़काव करें।

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